Indore

‘तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं’… पत्नी के एक वाक्य के बाद हुई हत्या, MP हाई कोर्ट ने दोषी पति की उम्रकैद घटाकर की 7 साल


महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी पति की आजीवन कारावास की सजा घटाकर सात वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दी।

Publish Date: Sat, 27 Jun 2026 08:20:32 PM (IST)Updated Date: Sat, 27 Jun 2026 08:20:32 PM (IST)

'तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं'... पत्नी के एक वाक्य के बाद हुई हत्या, MP हाई कोर्ट ने दोषी पति की उम्रकैद घटाकर की 7 साल
बयान के बाद आवेश में हुई हत्या पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला

HighLights

  1. बयान के बाद आवेश में हुई हत्या पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
  2. कोर्ट पूर्व नियोजित हत्या नहीं, अचानक उकसावे में हुआ अपराध
  3. उम्रकैद की सजा घटाकर सात साल के सश्रम कारावास में बदली

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने पत्नी की हत्या के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोषी पति की आजीवन कारावास की सजा घटाकर सात वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दी। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने कहा कि जब अपराध पूर्व नियोजित न होकर अचानक मिले तीव्र उकसावे में हुआ हो, तो उसका मूल्यांकन भी उसी आधार पर किया जाना चाहिए।

पत्नी के कथित बयान के बाद हुआ विवाद

हाई कोर्ट ने पाया कि छिंदवाड़ा जिले के कुलबहेरी नदी घाट पर पति-पत्नी के बीच अचानक विवाद हुआ। इसी दौरान पत्नी ने कथित तौर पर पति से कहा, “तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं।” कोर्ट ने माना कि यह टिप्पणी अत्यंत अपमानजनक और तीव्र उकसावे वाली थी। इसके बाद आरोपित ने आवेश में पत्थर उठाकर पत्नी पर वार कर दिया।

पूर्व नियोजित हत्या के सबूत नहीं मिले

अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह सिद्ध नहीं हुआ कि आरोपित हत्या की पूर्व योजना बनाकर घटनास्थल पर पहुंचा था। घटना के तुरंत बाद उसने भागने के बजाय स्वयं पुलिस और पत्नी के स्वजनों को फोन कर पूरी जानकारी दी। कोर्ट ने इसे उसके आचरण का महत्वपूर्ण संकेत माना। साथ ही यह भी कहा कि सभी चोटें केवल पत्थर से वार करने से ही लगी हों, यह निर्विवाद रूप से सिद्ध नहीं हुआ। कुछ चोटें घटनास्थल पर पत्थरों पर गिरने से भी संभव थीं।

सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि अचानक मिले गंभीर उकसावे में आत्मसंयम खोने के कारण हुआ अपराध पूर्वनियोजित हत्या की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने हत्या के अपराध की प्रकृति में बदलाव करते हुए दोषी की उम्रकैद की सजा घटाकर सात वर्ष के सश्रम कारावास में परिवर्तित कर दी।

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