Indore

MP के दशरथ मांझी… बड़वानी का एक ऐसा गांव जहां 150-फीट ऊंचे पहाड़ का सीना चीर लोग खुद बना रहे राह


तारीखें बदलती रहीं, चुनाव आते-जाते रहे और जनसुनवाई के दफ्तरों में अर्जियों के ढेर बड़े होते गए। मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सुदूर पाटी विकासखंड में एक छोटा सा आदिवासी इलाका है – खोड़ी पलास फलिया। यहां रहने वाले 40 परिवारों के लिए सुबह का मतलब सूरज उगना नहीं, बल्कि अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए एक मुश्किल पहाड़ से जंग लड़ना था। सालों तक जब सरकारी कागजों पर विकास की कोई लकीर इस गांव तक नहीं पहुंची, तो यहां के लोगों ने एक ऐसा फैसला किया जिसने पूरे प्रशासनिक ढांचे को आईना दिखा दिया है।

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इमेज सोर्स – सोशल मीडिया

जब वादे ‘चुनावी स्याही’ की तरह धुंधले हो गए

इस फलिया में रहने वाले 250 लोगों की मांग कोई बहुत बड़ी नहीं थी। उन्हें सिर्फ मुख्य मार्ग से जुड़ने के लिए एक अच्छी सड़क चाहिए थी। हर चुनाव में नेताओं की गाड़ियां धूल उड़ाती हुई यहां आती थीं, मंच से विकास के बड़े-बड़े दावे गूंजते थे, लेकिन वोटिंग खत्म होते ही वे वादे भी नेताओं की गाड़ियों की तरह गायब हो जाते। जनपद से लेकर जिला मुख्यालय तक, ऐसा कोई दफ्तर नहीं बचा जहां ग्रामीणों ने गुहार न लगाई हो। हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन का झुनझुना थमा दिया गया।

चारपाई पर डोलती सांसें और भीगते बस्ते

एक सड़क न होने की कीमत यह गांव कैसे चुका रहा था, यह देखना बेहद दर्दनाक था।

बचपन की कतरनें: बच्चों को हर सुबह कटीली झाड़ियों और नुकीले पत्थरों वाले रास्तों से गुजरकर स्कूल जाना पड़ता। मॉनसून के दिनों में कई बार पैर फिसलने से कपड़े और किताबें कीचड़ में सान जाते, जिससे उनकी पढ़ाई महीनों के लिए ठप हो जाती।

झोली में कैद इलाज: सबसे खौफनाक मंजर तब होता जब कोई गर्भवती महिला प्रसव पीड़ा से तड़पती या कोई बुजुर्ग अचानक बीमार हो जाता। एम्बुलेंस गांव से कोसों दूर खड़ी रहती और ग्रामीण मरीज को कपड़े की झोली या बांस की चारपाई पर लादकर पहाड़ों के रास्ते दौड़ते। कई बार तो अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में चीखें खामोश हो जाती थीं।

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चौपाल की वह एक रात, जिसने बदल दिया इतिहास

‘आखिर कब तक?’ गांव की चौपाल पर बैठी पंचायत में इस एक सवाल ने सबकी आंखों में अंगारे भर दिए। ग्रामीणों को समझ आ गया था कि सरकारी फाइलों के भरोसे बैठे रहे, तो पीढ़ियां यूं ही दम तोड़ती रहेंगी। इसके बाद जो हुआ, वह आत्मनिर्भरता की एक मिसाल है।

अत्यंत सीमित आय वाले इन आदिवासी परिवारों ने किसी योजना का इंतजार किए बिना खुद चंदा करने का संकल्प लिया। हर घर ने अपनी जेब टटोली और दस-दस हजार रुपये तक की बड़ी रकम इकट्ठा कर डाली। इस सामूहिक पूंजी से एक जेसीबी मशीन किराए पर ली गई और देखते ही देखते पूरा गांव एक नए मिशन पर निकल पड़ा।

हौसले के आगे झुकने लगा मूक पहाड़

आज खोड़ी पलास फलिया में कोई तमाशाबीन नहीं है। गांव ने मिलकर दो टीमें बनाई हैं। हर सुबह करीब 35-40 लोग कुदाल और फावड़े लेकर मोर्चे पर डट जाते हैं। कोई चट्टानों को खिसका रहा है, तो कोई मिट्टी बिछाकर रास्ते को समतल कर रहा है।

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पसीने और पक्के इरादों की बदौलत महज सात दिनों के भीतर आधा किलोमीटर का पथरीला रास्ता एक सुगम मार्ग में तब्दील हो चुका है। अब ग्रामीणों के सामने एक ही चुनौती है, ‘मानसून के आने से पहले बाकी बचे डेढ़ किलोमीटर के हिस्से को भी पूरी तरह तैयार करना, ताकि इस बार बारिश उनकी रफ्तार न रोक सके।’

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