Indore

27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर एमपी हाईकोर्ट में ऋग्वेद से इंदिरा साहनी के न्यायदृष्टांत तक गूंजे तर्क


सुनवाई निर्धारित समय से आगे बढ़ी और कोर्ट ने दलीलें पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे होगी।

Publish Date: Wed, 29 Jul 2026 08:46:20 PM (IST)Updated Date: Wed, 29 Jul 2026 08:53:16 PM (IST)

27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर एमपी हाईकोर्ट में ऋग्वेद से इंदिरा साहनी के न्यायदृष्टांत तक गूंजे तर्क
27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण।

HighLights

  1. हाई कोर्ट में ऋग्वेद से इंदिरा साहनी के न्यायदृष्टांत तक गूंजे तर्क
  2. -27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट में मैराथन बहस जारी, आज भी रखे जाएंगे तर्क

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश आनंद पाठक व न्यायमूर्ति विनय सराफ की विशेष युगलपीठ के समक्ष बुधवार को भी 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर लंबी सुनवाई हुई।

बहस के दौरान भारतीय समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ऋग्वेद काल की जातीय व्यवस्था, मनुस्मृति, संविधान की मूल भावना और सुप्रीम कोर्ट के चर्चित इंदिरा साहनी (मंडल आयोग) के न्यायदृष्टांत तक पर विस्तृत संवैधानिक तर्क रखे गए। सुनवाई निर्धारित समय से आगे बढ़ी और कोर्ट ने दलीलें पूरी करने के लिए अतिरिक्त समय भी दिया। अब मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे होगी।

ओबीसी पक्ष के अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने दलील दी कि आरक्षण केवल सामाजिक कल्याण की योजना नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन में सभी वर्गों की समान भागीदारी सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में जातिगत विभाजन की ऐतिहासिक जड़ें ऋग्वेद काल और बाद में मनुस्मृति आधारित सामाजिक संरचना में रही हैं, जिसके कारण अनेक वर्ग सदियों तक मुख्यधारा से दूर रहे।

इसी ऐतिहासिक असमानता को दूर करने के लिए संविधान ने आरक्षण का प्रविधान किया। बहस के दौरान इंदिरा साहनी फैसले में निर्धारित 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा पर भी सवाल उठाए गए। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि न्यायपालिका संविधान की व्याख्या कर सकती है, लेकिन नई संवैधानिक सीमाएं निर्धारित नहीं कर सकती। इसलिए आरक्षण का निर्धारण संविधान की मूल भाषा और उसकी मंशा के आधार पर होना चाहिए।

क्वांटिफिएबल डेटा : सुप्रीम कोर्ट ने गणना का स्पष्ट मानदंड तय नहीं किया

  • ओबीसी पक्ष ने कहा कि 27 प्रतिशत आरक्षण उनकी वास्तविक जनसंख्या के अनुपात में पर्याप्त नहीं है।
  • संविधान में राष्ट्रपति चुनाव, संसद, विधानसभा और स्थानीय निकायों सहित प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या को माना गया है।
  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को भी आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला है, इसलिए यही सिद्धांत ओबीसी पर भी लागू होना चाहिए।
  • साथ ही यह भी तर्क रखा गया कि सर्वोच्च न्यायालय ने क्वांटिफिएबल डेटा की अवधारणा तो दी है।
  • लेकिन उसकी गणना का स्पष्ट मानदंड तय नहीं किया, जिससे राज्यों के सामने संवैधानिक और प्रशासनिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है।
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