121 साल पहले अधूरी रह गई थी महाराजा सिंधिया की हसरत, किया था 1 लाख का शाही प्रयोग… कूनो की अनसुनी कहानी
मोहन कुमार, नईदुनिया, नई दिल्ली। हवा में तैरती सूखी पत्तियों की सरसराहट, घने जंगलों के बीच से छनकर आती धूप और अचानक जेहन में कौंधती एक ऐसी फुर्ती, जो सिर्फ कूनो के सुल्तानों- यानी चीतों के पास है। आज कूनो नेशनल पार्क का जिक्र आते ही आंखों के सामने अफ्रीकी मेहमानों की अठखेलियां तैरने लगती हैं, लेकिन इस आधुनिक कामयाबी के पीछे सदियों पुराना एक ऐसा इतिहास दफन है, जिसमें मुगल शहंशाहों के शिकार का रोमांच भी है और ग्वालियर के महाराजाओं की अधूरी हसरतों का दर्द भी।
इन दिनों जब देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू कूनो की इस ऐतिहासिक धरती पर कदम रख रही हैं, तो यहां की हवाएं सिर्फ चीतों की दास्तां नहीं सुना रहीं, बल्कि आज से 121 साल पहले इथियोपिया से आए उन शेरों ‘मजनू’ और ‘रामप्यारी’ की यादों को भी ताजा कर रही हैं, जिन्हें बसाने के लिए कभी पानी की तरह पैसा बहाया गया था।
आइए, कूनो की उस घाटी में ठहरकर इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, जहां कभी हाथियों के झुंड घूमा करते थे और जहां आज भारत का सबसे बड़ा ‘वाइल्डलाइफ मिरेकल’ सांस ले रहा है।
जब मुगलों और अंग्रेजों की पसंद बना कूनो का जंगल
इतिहास के पन्नों को पलटें तो कूनो और उसके आसपास का श्योपुर-शिवपुरी क्षेत्र कभी विशालकाय हाथियों और गरजते हुए शेरों का प्राकृतिक पर्यावास हुआ करता था। ग्वालियर रियासत के साल 1902 के गजेटियर के अनुसार, साल 1564 में जब मुगल शहंशाह अकबर मालवा की विजय से वापस लौट रहे थे, तब उन्होंने शिवपुरी के जंगलों में हाथियों के एक बड़े झुंड का शिकार किया था।

कूनो ने ब्रिटिश हुकूमत का ध्यान भी खींचा
समय बदला और 20वीं सदी की शुरुआत में कूनो की इस खूबसूरत घाटी ने ब्रिटिश हुकूमत का ध्यान खींचा। साल 1904 में तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराजा माधवराव सिंधिया के निमंत्रण पर भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन यहां शिकार के लिए आए। कूनो की प्राकृतिक बनावट से प्रभावित होकर कर्जन ने सुझाव दिया कि गुजरात के जूनागढ़ (गिर) से शेरों को लाकर यहां बसाया जाए। हालांकि, जूनागढ़ के नवाब की बेरुखी की वजह से यह योजना हकीकत का रूप नहीं ले सकी।
महाराजा ने किया था 1 लाख का शाही खर्च
गिर से निराशा मिलने के बाद महाराजा सिंधिया ने हार नहीं मानी। साल 1905 में लॉर्ड कर्जन और फारसी विशेषज्ञ डीएम ज़ाल के सहयोग से अफ्रीकी देश इथियोपिया से 10 शेरों को भारत मंगाने का फैसला किया गया। उस दौर में महाराजा ने इस पूरी कवायद के लिए 1 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की थी।

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तीन शेरों ने तोड़ दिया था दम
समुद्री रास्ते से बॉम्बे (मुंबई) बंदरगाह तक आने के दौरान 3 शेरों ने दम तोड़ दिया। बचे हुए 7 शेरों (3 नर और 4 मादा) का स्वागत करने के लिए खुद महाराजा सिंधिया मौजूद थे। इन मेहमानों के नाम भी बेहद दिलचस्प रखे गए थे। नर शेरों को ‘बुंदे’, ‘बांके’ और ‘मजनू’ कहा गया, जबकि मादाओं के नाम ‘रमाईली’, ‘रामप्यारी’, ‘बिजली’ और ‘गैंदी’ थे। हालांकि, इन्हें बाद में शिवपुरी के जंगलों में छोड़ा गया, जहां 1910 से 1912 के बीच ये हिंसक और आदमखोर हो गए, जिसके चलते भारत की यह पहली शेर पुनर्वास परियोजना बंद करनी पड़ी।

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चीता प्रोजेक्ट से वैश्विक क्षितिज पर चमक
सदियों पुराने इस उतार-चढ़ाव के बाद 17 सितंबर 2022 को कूनो के इतिहास में सबसे बड़ा मोड़ आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से आए 8 चीतों को यहां के जंगलों में छोड़ दिया, जिससे दुनिया के सबसे बड़े वन्यजीव पुनर्वास कार्यक्रम की शुरुआत हुई। आज कूनो नेशनल पार्क दुनिया भर में चीतों के सबसे सफल और सुरक्षित ठिकाने के रूप में स्थापित हो चुका है।
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ऑल इंडिया रेडियो की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2025 तक इस पार्क में चीतों का कुनबा बढ़कर 30 तक पहुंच गया है, जिसमें 12 वयस्क, 9 किशोर और 9 शावक शामिल हैं। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इनमें से 19 चीतों का जन्म भारत की ही धरती पर हुआ है।
