Indore

सातवें वेतनमान पर सरकार को फिर झटका, ग्‍वालियर हाई कोर्ट ने खारिज की राज्य की रिव्यू याचिका


सभी विभागों के कर्मचारियों को एक जनवरी 2016 से लाभ दिया गया है। ऐसे में केवल विभाग के आधार पर पीएचई कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

Publish Date: Fri, 31 Jul 2026 11:46:35 PM (IST)Updated Date: Fri, 31 Jul 2026 11:49:50 PM (IST)

सातवें वेतनमान पर सरकार को फिर झटका, ग्‍वालियर हाई कोर्ट ने खारिज की राज्य की रिव्यू याचिका
ग्‍वालियर हाई कोर्ट

HighLights

  1. हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने कहा।
  2. पूर्व आदेश में कोई प्रत्यक्ष त्रुटि नहीं है।
  3. जिसके आधार पर की जा सके समीक्षा।

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग के कर्मचारी गोपाल सिंह को सातवें वेतन आयोग का लाभ एक जनवरी 2016 से देने संबंधी अपने पूर्व आदेश में हस्तक्षेप से इन्कार करते हुए राज्य सरकार की पुनर्विचार (रिव्यू) याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि आदेश में ऐसी कोई प्रत्यक्ष त्रुटि नहीं है, जिसके आधार पर समीक्षा की जा सके।

राज्य सरकार ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि पीएचई विभाग के आठ अगस्त 2022 के परिपत्र के अनुसार संबंधित कर्मचारी को संशोधित वेतनमान का लाभ 15 दिसंबर 2016 से मिलना चाहिए, जबकि पूर्व आदेश में एक जनवरी 2016 से लाभ देने के निर्देश दिए गए थे।

सरकार का कहना था कि इस परिपत्र पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया। वहीं, कर्मचारी की ओर से अधिवक्ता ने तर्क रखा कि इसी तरह के मामलों में हाईकोर्ट पहले ही समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों को एक जनवरी 2016 से सातवें वेतन आयोग का लाभ देने का आदेश दे चुका है।

उन्होंने पीएचई विभाग के कर्मचारी वीरेंद्र कुमार शिवहरे तथा लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के कर्मचारियों से जुड़े मामलों का संदर्भ देते हुए कहा कि राज्य सरकार स्वयं इन मामलों में यह स्वीकार कर चुकी है।

सभी विभागों के कर्मचारियों को एक जनवरी 2016 से लाभ दिया गया है। ऐसे में केवल विभाग के आधार पर पीएचई कर्मचारियों के साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।

समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ नहीं किया जा सकता भेदभाव

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि समान परिस्थितियों वाले कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि पुनर्विचार याचिका केवल तब स्वीकार की जा सकती है, जब आदेश में रिकार्ड पर स्पष्ट और प्रत्यक्ष त्रुटि हो। किसी निर्णय से असहमति या कानून की अलग व्याख्या समीक्षा का आधार नहीं बन सकती। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि पूर्व आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है और राज्य सरकार की रिव्यू याचिका निराधार है। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।

Please follow and like us:
error20
fb-share-icon584226
Tweet 20
fb-share-icon20

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error

Enjoy this blog? Please spread the word :)