‘मुनाफे के लिए कंपनियों को नहीं सौंप सकते अस्पताल!’ MP में 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण का चौतरफा विरोध, CM को भेजा ज्ञापन
नईदुनिया प्रतिनिधि, भोपाल । मध्य प्रदेश सरकार के रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को देने के फैसले का विरोध शुरू हो गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के विरुद्ध संयुक्त संगठन ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को ज्ञापन देकर प्रक्रिया को रोकने की मांग की है।
सफल नहीं रहा निजीकरण का निर्णय
संगठनों का कहना है कि स्वास्थ्य सेवा देना सरकार का काम है, इसे मुनाफे के लिए निजी कंपनियों को नहीं सौंपा जा सकता। ज्ञापन पर 12 संगठनों ने हस्ताक्षर किए हैं। संगठनों ने याद दिलाया कि 2015 में अलीराजपुर जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को निजी हाथों में देने का प्रयोग असफल रहा था। सरकार को उसे वापस लेना पड़ा था।
2020-21 में नीति आयोग का जिला अस्पताल निजीकरण का प्रस्ताव भी विरोध के बाद रुक गया। 2024-25 में भी जिला अस्पतालों के निजीकरण की कोशिश का डाक्टरों और कर्मचारियों ने विरोध किया था।
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असल दिक्कत पैसा और डॉक्टरों की कमी
संगठनों का कहना है कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की सबसे बड़ी समस्या पैसों और कर्मचारियों की कमी है। ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में 4,134 उप-स्वास्थ्य केंद्र, 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कम हैं।
मध्य प्रदेश लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग की वार्षिक प्रतिवेदन 2025-26 के अनुसार राज्य में केवल 55 जिला अस्पताल, 51 ट्रामा सेंटर, 158 सिविल अस्पताल, 348 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 1,442 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 10,256 उप-स्वास्थ्य केंद्र तथा मात्र पांच पॉलीक्लिनिक संचालित हैं।
जबकि 5,543 स्वीकृत विशेषज्ञ चिकित्सकों के पदों में से 3,698, 6,513 चिकित्सा अधिकारियों के पदों में से 2,689 तथा 728 दंत चिकित्सा अधिकारियों के पदों में से 481 पद रिक्त हैं।
