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इंदौर में अब हिंदी माध्यम में होगी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, प्रदेशभर का पहला कॉलेज बना SGSITS, 60 सीटों को मिली मंजूरी


ग्रामीण इलाकों से आने वाले विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर श्री गोविंदराम सेकसरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस इंदौर में पहली बार इंजीनियरिंग …और पढ़ें

Publish Date: Tue, 07 Jul 2026 09:11:46 PM (IST)Updated Date: Tue, 07 Jul 2026 09:11:45 PM (IST)

इंदौर में अब हिंदी माध्यम में होगी इंजीनियरिंग की पढ़ाई, प्रदेशभर का पहला कॉलेज बना SGSITS, 60 सीटों को मिली मंजूरी
SGSITS में हिंदी माध्यम में सिविल ब्रांच की होगी पढ़ाई।

HighLights

  1. 1 साल में ITI तो 3 साल में मिलेगा सिविल डिप्लोमा
  2. SGSITS के नए हिंदी कोर्स में ‘मल्टीपल एंट्री-एग्जिट’
  3. हिंदी माध्यम बीटेक सिविल कोर्स को AICTE की मंजूरी

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। ग्रामीण इलाकों से आने वाले विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर श्री गोविंदराम सेकसरिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (SGSITS) इंदौर में पहली बार इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी माध्यम से करवाई जाएगी। इसकी शुरुआत 2026-27 शैक्षणिक सत्र से बीटेक सिविल ब्रांच से की गई है।

ऐसा करने के पीछे असल वजह यह है कि देशभर में अधिकांश निर्माण स्थलों पर मजदूरों से हिंदी या स्थानीय भाषा में ही संवाद करना पड़ता है। मगर कई बार इंजीनियर्स को निर्माण से जुड़ी जानकारी मजदूरों को देने में दिक्कतें आती हैं। हिंदी माध्यम से पढ़ाई करवाने से इंजीनियर उन्हें डिजाइन, सुरक्षा नियम और कार्य की प्रक्रिया आसानी से समझा सकेंगे।

छात्र के लिए चार साल पढ़ने की बाध्यता नहीं होगी

उधर कोर्स में छात्र के लिए चार साल पढ़ने की बाध्यता नहीं होगी। प्रथम वर्ष में छात्र को इस तरह पढ़ाया जाएगा कि वह आईटीआई (ITI) के ड्राफ्ट्समैन बराबर काम कर सके। इसके अलावा द्वितीय वर्ष में उसकी पढ़ाई इतनी होगी कि वह साइट सुपरविजन का काम कर सकेगा। तृतीय वर्ष की पढ़ाई पूरी करने पर उसे सिविल में डिप्लोमा मिल जाएगा। वहीं चतुर्थ वर्ष की पढ़ाई पूरी कर छात्र डिग्री पा सकेगा।

सिर्फ दो छात्रों ने लिया प्रवेश, काउंसलिंग प्रक्रिया जारी

हिंदी माध्यम में बीटेक सिविल ब्रांच पाठ्यक्रम का प्रस्ताव एआईसीटीई (AICTE) से मंजूर हो चुका है। इसमें 60 सीटें रखी गई हैं, जिसमें पहले चरण की काउंसलिंग में 35 सीटें आवंटित की गई थीं, लेकिन विद्यार्थियों की रुचि पाठ्यक्रम में कम नजर आ रही है। इसके चलते पहले चरण की काउंसलिंग संपन्न होने तक महज दो विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया है। हालांकि इसमें अभी प्रवेश प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों के मुताबिक संस्थान ने पाठ्यक्रम को लेकर सिलेबस बना लिया है। विद्यार्थियों को हिंदी में किताबें उपलब्ध करवाई जाएंगी।

नई शिक्षा नीति (NEP) के तहत मिलेंगे क्रेडिट पॉइंट

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत विद्यार्थियों को एंट्री और एग्जिट करना आसान होगा। छात्र चाहें तो पहले वर्ष या द्वितीय वर्ष तक पढ़ाई कर पाठ्यक्रम को बीच में छोड़ सकते हैं। इस बीच नौकरी कर दोबारा कोर्स में विद्यार्थी प्रवेश ले सकेगा। खास बात यह है कि एनईपी (NEP) में पाठ्यक्रम में अंकों की बजाय विद्यार्थियों का मूल्यांकन क्रेडिट पर किया जाएगा। प्रत्येक वर्ष की पढ़ाई के लिए निर्धारित क्रेडिट पॉइंट रखे गए हैं। विद्यार्थियों को इन मापदंडों पर खरा उतरना होगा। अधिकारियों के मुताबिक इस पाठ्यक्रम को कुछ इस तरह से तैयार किया गया है, जिसमें छात्र भारत के परंपरागत मंदिर, महल और अन्य संरचनाएं व पारंपरिक ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे।

स्थानीय भाषा में तकनीकी शिक्षा का लाभ

विशेषज्ञों का मानना है कि मातृभाषा में तकनीकी शिक्षा उपलब्ध होने से ग्रामीण और हिंदी माध्यम पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को इंजीनियरिंग जैसे कठिन विषयों को समझने में आसानी होगी। साथ ही यह कदम स्किल डेवलपमेंट और लोकल इंडस्ट्रीज में काम करने की क्षमता को और मजबूत करेगा।

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हिंदी माध्यम से इंजीनियरिंग के ये होंगे बड़े फायदे

  • निर्माण के दौरान भाषा की वजह से होने वाली गलतफहमियां कम होंगी। इससे निर्माण कार्य की गुणवत्ता बेहतर होगी। साथ ही तकनीकी त्रुटियों में कमी आएगी।
  • साइट पर सुरक्षा निर्देश यदि सरल हिंदी में दिए जाएंगे तो मजदूर उन्हें आसानी से समझेंगे और दुर्घटनाओं की संभावना भी कम होगी।
  • इंजीनियर ड्राइंग, माप, सामग्री और निर्माण तकनीकों को मजदूरों तक सरल भाषा में पहुंचा पाएंगे, जिससे कार्य की गति और गुणवत्ता दोनों बढ़ेंगी।
  • सरकारी और निजी निर्माण परियोजनाओं में हिंदी भाषी इंजीनियर स्थानीय टीम के साथ बेहतर समन्वय स्थापित कर सकेंगे। कार्य को समझाने में आसानी होगी। सामान्य इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम की तुलना में हिंदी माध्यम से सिविल ब्रांच की पढ़ाई काफी अलग है।

विद्यार्थियों को निर्माण स्थल पर बेहतर संवाद स्थापित कर मजदूरों से कार्य समझाने में आसानी होगी। चार वर्षीय पाठ्यक्रम को अलग-अलग विधाओं में बांटा गया है। पाठ्यक्रम का सिलेबस तैयार हो चुका है। यहां तक कि शिक्षक भी विद्यार्थियों को सामान्य भाषा में अध्ययन करवा सकेंगे। डॉ. संदीप नारुलकर, प्रशासनिक अधिकारी, SGSITS

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