Indore

इंदौर हाई कोर्ट ने वाट्सअप मैसेज को माना मृत्युपूर्व कथन, जमानत देने से इंकार


कोर्ट ने इन्हें महत्वपूर्ण साक्ष्य माना है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह इलेक्ट्रानिक सबूत एक महत्वपूर्ण प्रथम दृष्टया ”मृत्युपूर्व कथन” है।

Publish Date: Thu, 06 Aug 2026 08:10:14 PM (IST)Updated Date: Thu, 06 Aug 2026 08:17:04 PM (IST)

इंदौर हाई कोर्ट ने वाट्सअप मैसेज को माना मृत्युपूर्व कथन, जमानत देने से इंकार
इंदौर हाई कोर्ट।

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में 25 वर्षीय आदिवासी युवक के मोबाइल में मिले वाट्सअप मैसेज को प्रथमदृष्टया महत्वपूर्ण ”मृत्यूपूर्व कथन” (मृत्यु के समय दिया गया बयान) मानते हुए तीन आरोपितों को जमानत देने से इंकार कर दिया।

सिर्फ इतना ही नहीं न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने धार के विशेष न्यायालय के 27 जुलाई के आदेश को यथावत रखते हुए न सिर्फ जमानत याचिकाएं खारीज की बल्कि विशेष न्यायालय के विरुद्ध की गई अपील भी निरस्त कर दी।

धार जिला निवासी संतोष, उर्फ लखन औसारी ने आत्महत्या कर ली थी। आरोप है कि आरोपित करण जाट, धर्मेंद्र जाट और उमेश जाट ने कृषि भूमि के विवाद में उसे परेशान करते हुए गाली-गलौज की और अपमानित करते हुए जान से मारने की धमकी दी थी। 7 मई को मृत्यु से पहले औसारी ने अपने पिता को वाट्सअप पर तीन मैसेज भेजे थे। अभियोजन ने इन वाट्सअप मैसेज को कोर्ट में प्रस्तुत किया था।

कोर्ट ने इन्हें महत्वपूर्ण साक्ष्य माना है। हाई कोर्ट ने कहा कि यह इलेक्ट्रानिक सबूत एक महत्वपूर्ण प्रथम दृष्टया ”मृत्युपूर्व कथन” है। इन मैसेज में अपीलार्थियों के नाम स्पष्ट रूप से लिए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि इसके अलावा, जांच के दौरान दर्ज मृतक के पिता और भाई के बयान अभियोजन पक्ष की कहानी की पुष्टि करते हैं।

दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अपीलकर्ताओं ने कृषि भूमि के पुराने विवाद को लेकर मृतक को धमकाया, गाली दी और अपमानित किया। उसे लगातार जान से मारने की धमकियां दी गईं, जिसके कारण कथित तौर पर उसने अपनी जान दे दी। इधर आरोपितों की ओर से तर्क रखा गया कि आरोपितों का औसारी की आत्महत्या से कोई संबंध नहीं था। उन्हें पुरानी दुश्मनी की वजह से मामले में फंसाया गया था।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि औसारी ने अपनी मौत से पहले भेजे गए वाट्सअप मैसेज में आरोपितों का नाम लिया था। मृतक के परिवार के करीबी सदस्यों के बयान उसे लगातार परेशान किए जाने की ओर इशारा करते हैं। अपीलार्थियों की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है जिसके आधार पर उन्हें जमानत दी जाए।

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